तीन युवा लड़कियाँअपने दर्दनाक अतीत व दिल और दिमाग में खुदी दर्दभरी यादें लेकर श्री श्री सेवा मंदिर, गुंटूर आयीँ थीं । महोदया ‘माँ’ के संरक्षण और स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन से, आज ज्योति, तत्वमसि और श्रावणी एक जीवंत व अविनाशी उत्साह के साथ मुस्कुराती हैं। इन तीनों की जीवन कहानी जानने हेतु यहाँ क्लिक करें।

किराया नियंत्रण अधिनियम का उद्देश्य मालिक को उनकी वास्तविक संपत्तियों से वंचित करना नहीं है: राजस्थान हाईकोर्ट

किराया नियंत्रण अधिनियम का उद्देश्य मालिक को उनकी वास्तविक संपत्तियों से वंचित करना नहीं है: राजस्थान हाईकोर्ट

"यह देखा नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? जा सकता है कि किराया नियंत्रण कानून मकान मालिक और किरायेदार के बीच एक उचित संतुलन बनाने का हकदार था। एक तरफ जहां किरायेदार को आक्रामक रूप से डिजाइन किए गए लालची मकान मालिक के हाथों अपनी बेदखली नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा की आवश्यकता होती है, साथ ही मकान मालिक को भी उचित रूप से किराया बढ़ाने और कानून में अनुमेय आधार पर किरायेदार को बेदखल करने के लिए सुरक्षा की आवश्यकता होती है। किराया नियंत्रण अधिनियम, 1950 का मूल उद्देश्य बेईमान जमींदारों से किरायेदार के उत्पीड़न को बचाना है। किराया नियंत्रण अधिनियम, 1950 नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? का उद्देश्य जमींदारों को उनकी वास्तविक संपत्तियों से वंचित करना नहीं है।"

‘बीमारी का कारण नकारात्मक विचार’

alirajpur

आलीराजपुर. वर्तमान समय प्रत्येक मानव का मन कमजोर व तमो प्रधान होने के कारण जीवन में अनेक पाप कर्म, समस्याएं, बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। दुनिया में अनेक तरह की पेथी होने के बावजूद भी शारीरिक मानसिक नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? रोग बढ़ते जा रहे हैं। इन सभी का कारण नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? है जब मानव मन में ऊर्जा का संतुलन बिगड़ जाता है ऊर्जा के अनिश्चितता के कारण निर्धारित मार्ग के बजाय, भिन्न-भिन्न मार्गों में उर्जा बहने लगती है, आंतरिक अंगों में विकृति आने लगती है रोग बढऩे लगता है। अवांछित तनाव से शारीरिक अंग विकृत होने लगते हैं। रोग का कारण हमारा स्वयं का मन है जब भी कोई रोग हो जाता है तो उसका दोष हम औरों पर देते हैं जबकि हमारे नकारात्मक विचार ही बीमारी के कारण होता है। यह बात ब्रह्मकुमार नारायण भाई ने व्यक्तित्व विकास शिविर में मुख्य वक्ता के तौर पर कही।

प्रवचन : संतुलन में रहना ही धर्म है

प्रवचन : संतुलन में रहना ही धर्म है

संसार और ईश्वर के बीच संतुलन बना कर चलना ही मनुष्य का धर्म है। जीवन का प्रत्येक क्षण मनुष्य के लिए एक उपहार है। सामने जो क्षण है, उसे उसी रूप में पूरी तरह स्वीकार करना ही धर्म का मर्म है।


ध्यात्मिक पथ पर तीन कारक होते हैं: बुद्ध- सत्गुरु या ब्रह्मज्ञानी; संघ- सम्प्रदाय या समुदाय और; धर्म- नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? आपकी प्रकृति, आपका सच्चा स्वभाव। आप बुद्ध के जितना निकट जाएंगे, आपको उतना ही अधिक आकर्षण मिलेगा, आप ब्रह्मज्ञानी से कभी ऊबते नहीं। जितना समीप जाएंगे, उतनी ही नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? अधिक नवीनता और प्रेम का अनुभव मिलता है।

भारत में महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम

आर्ट ऑफ़ लिविंग के महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के माध्यम से, भारत और कई अन्य देशों में महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त है और वे सामाजिक अन्याय के खिलाफ भी खड़ीं हुई हैं । इन महिलायों ने सकारात्मक परिवर्तन का सूत्रधार बनते हुए अन्य महिलाओं को भी शिक्षित व सशक्त बनाकर उनको अपनी आवाज व पहचान दिलाने में पुरजोर मेहनत की है।

आर्ट ऑफ़ लिविंग के महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम एक उत्प्रेरक हैं जिन्होंने सदियों के अस्थिर प्रतिबंधो से मुक्त कर महिलाओं को योग्य मंच प्रदान करने में मदद की है जहाँ से वे स्वयं को सशक्त बनाकर भिन्न-2 क्षेत्रों में अपनी समानता को प्राप्त करने हेतु अग्रसर हैं।

पूरे भारत में महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम से संबंधित कुछ सफलता की कहानियाँ।

  • सूखा प्रभावित देऊलगाँव को मिला पानी : आर्ट ऑफ़ लिविंग के 50 स्वयंसेवकों ने मिलकर गाँव के 400 परिवारों की जलापूर्ति के लिए 50 दिवसीय कार्यक्रम शुरू किया है
  • प्रोजेक्ट उड़ान बना रहा है 11000 यौनकर्मियों के जीवन को आसान !! - अधिक पढ़े

महिला सशक्तिकरण का पहला कदम

श्री श्री रवि शंकर जी कहते हैं - “सामाजिक असमानता, पारिवारिक हिंसा, अत्याचार और आर्थिक अनिर्भरता इन सभी से महिलाओं को छूटकारा पाना है तो जरुरत है महिला सशक्तिकरण की।

पहले ‘मै सक्षम हूँ’ इस बात का महिलाओं ने खुद को यकीन दिलाना जरुरी है। मै एक स्त्री हूँ इस आत्मग्लानि में ना रहें। जब आप आत्मग्लानी में आते हो तब आपकी ऊर्जा, उत्साह और शक्ती कम होने लगती है। अध्यात्म का मार्ग एक ही ऐसा मार्ग है जहाँ आप आत्मग्लानि और अपराधी भाव से मुक्त हो सकती हैं। आत्मग्लानि और अपराधी भाव - इन दोनों में हम अपने मन के छोटेपन अनुभव करते हैं। जिससे आप अपनी आत्मा से और दूर जाती हैं।

खुद को दोष देना बंद कर खुद की तारीफ करना शुरू करें। तारीफ करना दैवीय नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? गुण है, है ना?
मै स्त्री हूँ, अबला हूँ, ऐसी सोच भी कभी मन में ना लायें। ऐसी आंतरिक असमानता से कुछ भी हासिल नही होगा। आप डटकर खड़ी हो जायें, अपने अधिकार प्राप्त करने हेतु जिस क्षमता की जरुरत है वह सब आप में है।

शासन के नकारात्मक संतुलन के खिलाफ सुरक्षा क्या है? तीनों अंगों के बीच संतुलन जरुरी: प्रणब

प्रणब मुखर्जी

  • नई दिल्‍ली,
  • 12 जनवरी 2013,
  • (अपडेटेड 12 जनवरी 2013, 10:41 PM IST)

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने न्यायिक सक्रियता और न्यायपालिका की ‘व्यापक भूमिका’ की धारणा का जिक्र करते हुए कहा कि इस व्यापक भूमिका की धारणा ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों से भटकने पर कई बार विरोध का सामना किया है. बहरहाल, इस तरह की सक्रियता ने कुछ ऐसे सकारात्मक योगदान दिये हैं, जिन पर सवाल नहीं उठाये जा सकते.

प्रणब मुखर्जी ने ‘न्यायिक सुधार की हालिया प्रवृतियां: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि लेकिन, मैं यहां एक एहतियाती बात कहना चाहूंगा कि प्रत्येक लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक सूक्ष्म अंतर मौजूद है. राज्य के ये तीनों अंग अपनी जो भूमिका निभा रहे हैं उसमें व्यवधान नहीं आना चाहिए. उन्होंने कहा कि शासन के इन तीनों अंगों को अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए या ऐसी भूमिका नहीं निभानी चाहिए जिसकी संविधान उन्हें इजाजत नहीं देता है.

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